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रूसी तेल कटौती के बाद वेनेजुएला से खरीद पर नजर: रिलायंस अमेरिकी मंजूरी के लिए बातचीत में

डीडब्ल्यू की रिपोर्ट (रॉयटर्स के हवाले से) बताती है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज रूसी तेल की आपूर्ति घटने के बाद वेनेजुएला से कच्चा तेल खरीदने के लिए अमेरिकी अनुमति/लाइसेंस पर बातचीत कर सकती है. भारत पर रूसी तेल आयात रोकने का दबाव बढ़ने से विकल्पों की तलाश तेज हुई है.

रिपोर्ट
राष्ट्रीय खबरें न्यूज़ डेस्क
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भारत की ऊर्जा रणनीति 2026 की शुरुआत में नए मोड़ पर दिख रही है. डीडब्ल्यू की रिपोर्ट के अनुसार, रिलायंस इंडस्ट्रीज रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति में कटौती के बाद वेनेजुएला से तेल खरीदने के लिए अमेरिकी अनुमति (लाइसेंस/परमिट) पर बातचीत कर सकती है. रिपोर्ट में कहा गया कि कंपनी ने अमेरिकी मंजूरी के अनुरोध पर टिप्पणी के लिए भेजे गए ईमेल का तत्काल जवाब नहीं दिया.

रूसी तेल कटौती के बाद वेनेजुएला से खरीद पर नजर: रिलायंस अमेरिकी मंजूरी के लिए बातचीत में
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रिपोर्ट के मुताबिक, रिलायंस को पहले भी अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद वेनेजुएला से कच्चा तेल आयात करने के लिए लाइसेंस मिले थे. पीडीवीएसए (वेनेजुएला की सरकारी तेल कंपनी) के आंतरिक रिकॉर्ड के हवाले से बताया गया कि उन अनुमतियों के तहत 2025 के पहले चार महीनों में रिलायंस को करीब 63,000 बैरल प्रति दिन कच्चा तेल पहुंचाया गया.

ऊर्जा बाजार में यह एक बड़ी ‘री-अलाइनमेंट’ की तरह दिखता है: जहां एक तरफ भारत पर रूसी तेल आयात बंद करने को लेकर दबाव बढ़ने की चर्चा है, वहीं दूसरी तरफ वेनेजुएला के ‘अटके हुए’ कार्गो और उपलब्ध स्टॉक नए विकल्प के रूप में सामने आते हैं. रिपोर्ट में यह भी संकेत है कि लाखों बैरल वेनेजुएला कच्चा तेल समुद्री टैंकों और जहाजों पर फंसा हुआ है.

ऐसे में लाइसेंस की होड़ भी तेज होना स्वाभाविक है. रिपोर्ट में शेवरॉन, विटोल, ट्रैफिगुरा जैसी कंपनियों का उल्लेख है जो लाइसेंस और वेनेजुएला के तेल निर्यात पर नियंत्रण के लिए प्रतिस्पर्धा में बताई गई हैं. यह प्रतिस्पर्धा दिखाती है कि प्रतिबंध-प्रणाली के भीतर ‘कौन खरीद सकता है’ और ‘कौन नहीं’—यह सवाल खुद बाजार की दिशा तय करने लगा है.

भारत के लिए दांव दोहरे हैं: रिफाइनिंग की निरंतरता बनाए रखना और कच्चे तेल की लागत व सप्लाई जोखिम को संतुलित करना. अगर वेनेजुएला से आपूर्ति बढ़ती है तो यह रूसी बैरल की कमी की कुछ भरपाई कर सकती है, लेकिन यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी मंजूरी कितनी जल्दी और किन शर्तों पर मिलती है.

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