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पद्म पुरस्कार 2026: सूची में जर्मन विद्वान भी शामिल, विदेशियों की मौजूदगी पर फिर चर्चा

केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा पद्म पुरस्कार 2026 की सूची जारी होने के बाद इस बार एक जर्मन विद्वान के नाम ने खास ध्यान खींचा है. सम्मान सूची को सांस्कृतिक कूटनीति, वैश्विक सहयोग और ‘सॉफ्ट पावर’ के नजरिए से भी देखा जा रहा है.

रिपोर्ट
राष्ट्रीय खबरें न्यूज़ डेस्क
प्रकाशित

केंद्र सरकार ने 25 जनवरी 2026 को पद्म पुरस्कार 2026 की आधिकारिक सूची जारी की. सूची में देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आए नामों के साथ एक जर्मन विद्वान का नाम भी शामिल है, जिसे लेकर सोशल मीडिया पर तत्काल चर्चा शुरू हो गई. समर्थकों का कहना है कि यह भारत की उस परंपरा का हिस्सा है जिसमें वैश्विक योगदान, शोध, भाषा-संस्कृति और अकादमिक सहयोग को भी सम्मानित किया जाता है, जबकि कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि विदेशी नागरिकों को इन सम्मानों में कितनी प्राथमिकता मिलनी चाहिए.

पद्म पुरस्कार 2026: सूची में जर्मन विद्वान भी शामिल, विदेशियों की मौजूदगी पर फिर चर्चा
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सरकार की ओर से जारी सूची में सम्मान पाने वालों के काम का क्षेत्र, उनकी उपलब्धियां और सार्वजनिक जीवन में योगदान निर्णायक माना जाता है. विशेषज्ञों के मुताबिक किसी विदेशी विद्वान का चयन अक्सर इस बात का संकेत होता है कि उसका काम भारत-केंद्रित अध्ययन, भारतीय भाषाओं, इतिहास, कला या किसी ऐसे क्षेत्र से जुड़ा रहा है, जिसने भारत के ज्ञान-परिस्थितिकी तंत्र को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत किया.

पुरस्कारों की घोषणा ऐसे समय में आई है जब भारत, वैश्विक मंच पर अपनी सांस्कृतिक कूटनीति को अधिक सक्रिय तरीके से आगे बढ़ा रहा है. विश्वविद्यालयों के बीच समझौते, शोध-फंडिंग, अनुवाद परियोजनाएं और संग्रहालय/सांस्कृतिक संस्थानों की साझेदारी—इन सभी में अंतरराष्ट्रीय नेटवर्किंग बढ़ी है. इस पृष्ठभूमि में, सूची में विदेशी नामों का दिखना कई लोगों के लिए ‘ग्लोबल एंगेजमेंट’ का एक संकेत भी है.

हालांकि आलोचकों का एक तर्क यह भी है कि भारत में ऐसे कई शोधकर्ता, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता और कलाकार हैं, जिनका काम दशकों से जमीनी स्तर पर असर डाल रहा है, लेकिन वे अक्सर सुर्खियों से दूर रहते हैं. उनके मुताबिक सम्मान प्रणाली में पारदर्शिता, नामांकन प्रक्रिया और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को लेकर लगातार सार्वजनिक संवाद होना चाहिए.

पद्म पुरस्कारों को लेकर हर साल यही बहस लौटती है—क्या चयन में लोकप्रियता का असर बढ़ रहा है, या विविध क्षेत्रों में ‘कम दिखने वाले’ काम को भी पर्याप्त जगह मिल रही है. कुछ विश्लेषक मानते हैं कि ऐसी बहसें लोकतांत्रिक समाज में जरूरी हैं, क्योंकि इससे सम्मान व्यवस्था पर भरोसा भी मजबूत होता है और सुधार की गुंजाइश भी सामने आती है.

सूची जारी होने के बाद अगला चरण सम्मान समारोह का होता है, जहां चुने गए लोगों को उनके योगदान के लिए आधिकारिक रूप से सम्मानित किया जाता है. इस बीच, जर्मन विद्वान के नाम ने यह सवाल भी फिर से उठाया है कि ‘राष्ट्रीय सम्मान’ की परिभाषा क्या सिर्फ नागरिकता तक सीमित है, या उस काम तक भी फैली है जिसने भारत को दुनिया में बेहतर समझा और समझाया.

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