भारत-ईयू ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’: 26 जनवरी 2026 के बाद व्यापार समझौते की घड़ी?
गणतंत्र दिवस 2026 की परेड में यूरोपीय संघ मुख्य अतिथि है। इसी बहाने भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहकर फिर से रफ्तार देने की कोशिशें तेज हैं।
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- राष्ट्रीय खबरें न्यूज़ डेस्क
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26 जनवरी 2026 की गणतंत्र दिवस परेड सिर्फ एक सांस्कृतिक-सेन्य आयोजन नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति का संकेतक भी है। इस बार परेड में मुख्य अतिथि यूरोपीय संघ (ईयू) है—पहली बार 27 देशों के इस समूह को यह आमंत्रण मिला है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेय लाएन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष अंटोनियो कोस्टा नई दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व से मुलाकातों के जरिए रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं। यह दौरा ऐसे वक्त में हो रहा है जब भारत और ईयू के बीच बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है।

‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ क्यों कहा जा रहा है?
दावोस के विश्व आर्थिक मंच में उर्सुला फॉन डेय लाएन ने भारत-ईयू समझौते को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहकर जिस तरह पेश किया, उससे संकेत मिला कि दोनों पक्ष इसे रणनीतिक-आर्थिक साझेदारी के अगले बड़े कदम के तौर पर देख रहे हैं। अक्टूबर 2025 में ब्रसेल्स में बातचीत का एक दौर हुआ था, लेकिन कई मुद्दों पर सहमति अब भी बाकी है। फिर भी 26 जनवरी 2026 का निमंत्रण और उसके बाद प्रस्तावित वार्ताएं बताती हैं कि राजनीतिक इच्छाशक्ति को व्यापारिक ढांचे में बदलने की कोशिश हो रही है।
आंकड़े क्या कहते हैं: व्यापार और निवेश का महत्व
यूरोपीय आयोग के मुताबिक 2023 में ईयू भारतीय उत्पादों का सबसे बड़ा साझेदार बन गया था और भारत के कुल निर्यात का 12.2% यूरोपीय बाजार तक पहुंचा। इसी वर्ष द्विपक्षीय व्यापार का मूल्य लगभग 124 अरब यूरो आंका गया। सेवाओं के क्षेत्र में भी 2020 से 2023 के बीच कारोबार 30.4 अरब यूरो से बढ़कर 59.6 अरब यूरो तक पहुंचा। दोनों पक्ष मानते हैं कि एक व्यापक एफटीए से यह आंकड़े कई गुना बढ़ सकते हैं, खासकर तब जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं भू-राजनीतिक तनावों के चलते फिर से आकार ले रही हैं।
डील से क्या बदल सकता है?
समझौते का एक बड़ा वादा नियमों के मानकीकरण से जुड़ा है। अभी ईयू के 27 देश भारत के साथ अलग-अलग राष्ट्रीय नीतियों के आधार पर कारोबार करते हैं और भारत को भी हर सदस्य देश के साथ ‘टेलर-मेड’ व्यवस्थाएं बनानी पड़ती हैं। एफटीए होने पर कंपनियों के लिए नियम-कायदे एकरूप हो सकते हैं, जिससे लागत घटने और निवेश बढ़ने की उम्मीद है। इस समय यूरोप की लगभग 6,000 कंपनियां भारत में मौजूद हैं और भारत को तकनीक व कौशल के कई क्षेत्रों में यूरोपीय साझेदारी की जरूरत है, जबकि ईयू को बड़े और तेज़ी से बढ़ते बाजार की तलाश है।
सबसे कठिन हिस्सा: लंबित मुद्दे
यही वह जगह है जहां कई दशकों से ‘ब्रेकथ्रू’ अटकता रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक दोनों पक्षों को 24 अहम मुद्दों पर स्पष्ट और स्वीकार्य सहमति बनानी होगी। इनमें उत्पादों की उत्पत्ति, बौद्धिक संपदा, पारदर्शिता, सरकारी खरीद के नियम, नियामक ढांचे, पूंजी प्रवाह, छूट/रियायतें और विवाद समाधान जैसे विषय शामिल हैं। इतिहास बताता है कि 2007 में शुरू हुई बातचीत 15 दौर के बाद 2013 में ठप हो गई थी और मई 2021 में ही इसे फिर से शुरू किया गया। अब 26 जनवरी 2026 के आसपास की बैठकों को ‘निर्णायक मोड़’ के रूप में देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर संदेश साफ है: प्रतीकात्मक कूटनीति को ठोस व्यापारिक ढांचे में बदलना ही असली परीक्षा है—और 26 जनवरी 2026 का कार्यक्रम दोनों पक्षों के लिए उसी दिशा में एक बड़ा राजनीतिक संकेत बन रहा है।