MGNREGA के नाम/ढांचे में बदलाव पर राहुल गांधी का हमला, ‘अपमान’ और ‘केंद्रीकरण’ का आरोप
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने मनरेगा (MGNREGA) के नाम और संरचना में बदलाव को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने इसे महात्मा गांधी का ‘अपमान’ बताते हुए कहा कि नई व्यवस्था से नियंत्रण केंद्रीकृत होगा और ग्रामीण मजदूरों की वित्तीय सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है।
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- राष्ट्रीय खबरें न्यूज़ डेस्क
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राहुल गांधी ने क्या कहा
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, रायबरेली के दौरे के दौरान कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने मनरेगा (MGNREGA) के नाम बदलने और योजना के पुनर्गठन को लेकर केंद्र सरकार पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि इस बदलाव के जरिए सरकार ने महात्मा गांधी का अपमान किया है।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि राहुल गांधी का दावा है—नई व्यवस्था (जिसे उन्होंने VB-G RAM G नाम से संबोधित किया) से नियंत्रण अधिक केंद्रीकृत होगा, वित्तीय सुरक्षा से जुड़े प्रावधान कमजोर हो सकते हैं और राज्यों पर खर्च का दबाव बढ़ेगा।
विवाद का केंद्र: अधिकार बनाम विवेकाधीन लाभ
मनरेगा को भारत में ग्रामीण रोजगार के ‘अधिकार-आधारित’ कार्यक्रम के तौर पर देखा जाता रहा है। आलोचकों का तर्क रहता है कि अगर फंडिंग/स्वीकृति की प्रक्रिया ज्यादा विवेकाधीन (डिस्क्रेशनरी) हुई, तो मजदूरों का भुगतान समय पर न होना, काम मिलने की अनिश्चितता और स्थानीय संस्थाओं की भूमिका घटने जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
रिपोर्ट के अनुसार राहुल गांधी ने इसी तर्क के आधार पर कहा कि बदलाव से पंचायत आधारित ढांचा कमजोर हो सकता है और ग्रामीण गरीबों के लिए मजदूरी सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
‘MGNREGA Bachao Sangram’ अभियान
रिपोर्ट में बताया गया है कि राहुल गांधी ने ‘MGNREGA Bachao Sangram’ नाम से एक अभियान की भी बात की, जिसे 10 जनवरी से 25 फरवरी (2026) तक चलाने का उल्लेख किया गया। लक्ष्य यह है कि योजना के पुराने स्वरूप को बहाल करने के लिए जनसमर्थन बनाया जाए और मुद्दे को राजनीतिक रूप से तेज किया जाए।
आगे की राजनीति
आने वाले हफ्तों में इस मुद्दे पर संसद के भीतर और बाहर बहस तेज होने की संभावना है। एक तरफ विपक्ष इसे ग्रामीण अधिकारों और विकेंद्रीकरण से जोड़कर उठाएगा, दूसरी तरफ सरकार की ओर से यह दलील दी जा सकती है कि बदलाव का उद्देश्य दक्षता बढ़ाना, वित्तीय अनुशासन मजबूत करना या बेहतर लक्ष्य-निर्धारण करना है।
ग्रामीण रोजगार और भुगतान व्यवस्था से जुड़े मुद्दे अक्सर चुनावी मौसम में तेज होते हैं, इसलिए राज्य स्तर पर भी इस बहस का असर दिख सकता है।