पश्चिम बंगाल में ‘एसआईआर’ को लेकर घमासान: चुनाव से पहले वोटर लिस्ट पुनरीक्षण बनता बड़ा मुद्दा
बिहार में विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) चुनावी मुद्दा नहीं बना था, लेकिन पश्चिम बंगाल में इसे लेकर सरकार, केंद्र और चुनाव आयोग के बीच टकराव तेज़ है. अप्रैल 2026 के संभावित विधानसभा चुनावों से पहले यह बहस निर्णायक मोड़ ले सकती है.
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- राष्ट्रीय खबरें न्यूज़ डेस्क
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पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है. डीडब्ल्यू की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार के हालिया विधानसभा चुनाव में एसआईआर कोई बड़ा मुद्दा नहीं बन सका था, लेकिन बंगाल में नवंबर से शुरू प्रक्रिया के बाद से यह राज्य सरकार, केंद्र और चुनाव आयोग के बीच टकराव के सबसे बड़े बिंदुओं में उभर आया है.

तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का आरोप है कि एसआईआर के मानकों और उसके क्रियान्वयन को लेकर राज्य के साथ अलग व्यवहार किया जा रहा है. ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को कई पत्र लिखे हैं और दावा किया है कि बिहार और बंगाल के लिए अलग-अलग मापदंड तय किए जा रहे हैं. राज्य सरकार की चिंता यह है कि कहीं पुनरीक्षण के नाम पर वैध मतदाताओं के नाम काटे न जाएं.
दूसरी तरफ, विपक्षी दल बीजेपी इस मुद्दे को अलग फ्रेम में देख रहा है. विपक्ष का तर्क है कि मतदाता सूची की शुद्धता लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है और यदि सूची में गड़बड़ियां हैं तो उन्हें सुधारना चाहिए. इसी के साथ, चुनाव से पहले यह मुद्दा दोनों दलों के लिए ‘राजनीतिक हथियार’ भी बनता जा रहा है—एक पक्ष इसे मतदाता अधिकार और निष्पक्षता से जोड़ रहा है, दूसरा पक्ष इसे शुद्धिकरण और पारदर्शिता से.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इस कवायद ने ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले बूथ लेवल ऑफिसर्स (बीएलओ) और प्रशासनिक ढांचे पर दबाव बढ़ाया है. प्रक्रिया जितनी व्यापक होगी, उतना ही डेटा सत्यापन, दस्तावेज़ जांच और आपत्तियों के निपटारे का बोझ बढ़ेगा. इससे राजनीतिक बयानबाजी के साथ-साथ प्रशासनिक दक्षता और समय-सीमा भी बड़े सवाल बन जाते हैं.
तृणमूल कांग्रेस ने चेतावनी दी है कि यदि एक भी वैध मतदाता का नाम कटता है तो पार्टी बड़े पैमाने पर विरोध करेगी. यह चेतावनी चुनावी रणनीति का हिस्सा भी है और जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए संदेश भी कि वोटर लिस्ट को लेकर सतर्क रहना है. वहीं, चुनाव आयोग के लिए चुनौती यह है कि प्रक्रिया पारदर्शी दिखे, शिकायतों पर भरोसेमंद कार्रवाई हो और किसी पक्ष को ‘पक्षपात’ का ठोस आधार न मिले.
अप्रैल 2026 के संभावित विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र, एसआईआर का मुद्दा केवल प्रशासनिक कार्यवाही नहीं रह गया है—यह अब ‘वैधता बनाम आशंका’ की राजनीति में बदल चुका है. आने वाले हफ्तों में अदालतों, आयोग और राजनीतिक दलों की कार्रवाइयों से तय होगा कि यह मुद्दा चुनावी विमर्श में कितना केंद्रीय स्थान लेता है.