घर के काम की ‘डबल शिफ्ट’ और महिलाओं की सेहत: असमान बोझ से बढ़ता तनाव, नींद और दीर्घकालिक जोखिम
महिलाओं पर घर के काम और देखभाल की जिम्मेदारियों का असमान बोझ उनकी शारीरिक और मानसिक सेहत पर असर डाल रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार लगातार दबाव, समय की कमी और ‘रिकवरी’ न मिलने से तनाव, थकान और दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिम बढ़ते हैं.
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- राष्ट्रीय खबरें न्यूज़ डेस्क
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महिलाओं की सेहत पर ‘घर के काम’ का असर अक्सर आंकड़ों और नीति बहस में पीछे छूट जाता है, लेकिन यह रोज़मर्रा की वास्तविकता है. डीडब्ल्यू की रिपोर्ट इस तरफ ध्यान दिलाती है कि जब घरेलू श्रम का बड़ा हिस्सा महिलाओं पर केंद्रित होता है, तो यह केवल समय की समस्या नहीं रहती—यह शारीरिक थकान, मानसिक तनाव और स्वास्थ्य व्यवहार (नींद, व्यायाम, भोजन) पर भी सीधा असर डालती है.

घरेलू कामों में खाना बनाना, सफाई, बच्चों/बुजुर्गों की देखभाल, पानी-खरीद/व्यवस्था, और भावनात्मक श्रम (emotional labor) जैसी जिम्मेदारियां शामिल होती हैं. जब यह सब नौकरी/पढ़ाई या अन्य बाहरी जिम्मेदारियों के साथ जुड़ता है, तो महिलाओं के लिए ‘डबल शिफ्ट’ जैसी स्थिति बनती है. इसका सबसे पहला असर थकान और नींद पर दिखता है—रिकवरी कम होती है और तनाव-हार्मोन का स्तर लंबे समय तक ऊंचा रह सकता है.
समय के साथ यह दबाव कई स्वास्थ्य जोखिमों में बदल सकता है: लगातार सिरदर्द, पीठ/कंधे में दर्द, पाचन समस्याएं, एंग्जायटी, डिप्रेशन के लक्षण, और कुछ मामलों में ब्लड प्रेशर या मेटाबॉलिक जोखिम. रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि महिलाएं अक्सर अपनी हेल्थ-चेकअप या स्वयं की देखभाल को प्राथमिकता सूची में नीचे रख देती हैं, क्योंकि घर और परिवार की जरूरतें तुरंत सामने होती हैं.
विशेषज्ञों के मुताबिक समाधान केवल ‘व्यक्तिगत टाइम मैनेजमेंट’ नहीं है. घरेलू श्रम का न्यायपूर्ण बंटवारा, परिवार के भीतर भूमिका-समझौते, और संस्थागत समर्थन—जैसे फ्लेक्सिबल वर्क, चाइल्डकेयर, और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच—महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. यानी यह मुद्दा व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक-आर्थिक ढांचे से भी जुड़ा है.
भारत सहित कई देशों में यह बहस इसलिए भी जरूरी है क्योंकि महिलाओं की श्रम-भागीदारी, उत्पादकता और समग्र कल्याण सीधे तौर पर इस ‘अदृश्य काम’ से प्रभावित होते हैं. जब घरेलू श्रम को पहचान और समर्थन मिलता है, तब ही महिलाओं की सेहत, काम और अवसरों में वास्तविक समानता की दिशा में ठोस बदलाव संभव होता है.
रिपोर्ट का सार यही संकेत देता है कि महिलाओं की सेहत पर चर्चा में ‘घरेलू काम’ को एक वास्तविक स्वास्थ्य निर्धारक (health determinant) मानना होगा. इसके बिना, तनाव और असमानता के मूल कारण बने रहते हैं—और उनका असर पीढ़ियों तक दिखाई देता है.